“साँझ ढले सखियाँ सब लौट गई सारीं,
अकेले हम नदिया किनारे,
माँझी तोरा, नाम तो बता,
फिर कैसे पुकारे तुझे, कैसे पुकारे
अकेले हम नदिया किनारे…..”

ऋतुपर्णो घोष की फ़िल्म रेनकोट से यह गीत, शुभा मुद्गल का गाया हुआ, बेहद सुकून-देय लगता है । आज यूँ ही फिर याद आ गया । साथ ही कॉलेज के दिनों की एक बात भी याद आई । कॉलेज के दिनों में वो बहुत सुना करती थी ऐसे गीत । ख़ास तौर पर बारिशों के मौसम में, पुणे जब हरिया जाता, तब अक़्सर इस गीत में, या फिर ऐसे कई और गीतों में चैन-सुकून खोजती । राग-रस कोई समझ या ज्ञान नहीं, बस, परख थी, पसंद थी । बीस में भी ज़रा बचपना था । वो rebel without a cause वाली बात थी कुछ । शायद वो उम्र होती ही है ऐसी, कुछ बेवजह सी बेकली रहती है ।

शाम कॉलेज से घर चल कर जाते वक़्त सुबह वाली बात याद आ गई और टपकते पेड़ों के साये में चलते वो यूँ अचानक हंस पड़ी कि आस पास चलते लोग कुछ चौंक से गए । सुबह उसकी रूम-मेट ने मावशी से कहा था कि वो उस्की जीन्स पॅन्ट अच्छे से धोएँ । ‘मावशी’ वो उनका घर साफ़ करने आती एक सज्जन औरत को कहते थे । मासी या मौसी का ही एक variation समझ लीजिये । तो, जी, मावशी को हिन्दी ठीक तरह समझ नहीं आती थी । और उनको मराठी नहीं आती! और मज़े की बात यूँ हुई कि जीन्स तो ज्यों की त्यों पड़ी रही, मावशी ने कमरे से जुड़ी बाल्कनी अच्छे से धो कर साफ़ कर दी ।

इस वाक़िये को मन ही मन याद कर जब वो हँसी तो आस पास चलते लोगों में से कुछ मुस्कुराए, और कुछ ने उसे यूँ देखा मानो लो कोई पागल हो ।

घर पहुँचते पहुँचते वो पूरी भीग चुकी थी, धीमी धीमी बारिश में चलते ।और आज तो हवा भी कुछ सर्द थी । माँ की नसीहत जैसे ख़ुद-ब-ख़ुद कानों में गूँज पड़ी, “बेटा, ज्ल्दी कपड़े बदलो और बाल सुखाओ, सर्दी लग जाएगी” और घर की यादें आँखों के सामने चित्र दिखाने लगीं, कि वो बाल सुखा कर, कपड़े बदल कर आती, तब तक माँ गरमा-गरम चाय बना रखती, और कभी शाम का वक़्त होता, तो पकोड़े भी…कितना मन कर रहा था आज…

बहरहाल, सूखे कपड़े पहन, गीले बाल गमछे में लपेट कर किचन में आई और चाय के लिये पानी उबलने रखा, अद्रक कूटते हुए ख़याल आया, और रूम-मेट के लिये भी चाय बन जाए उस हिसाब से पानी और डाल दिया । लैपटॉप पर गाने भी लगा आई । चाय का कप ले बाल्कनी की तरफ़ बढ़ी ही थी कि बॅल बजी, भीगी हुई रूम-मेट गरमा-गरम पकोड़े ले कर आई थी ।

बारिशों वाले दिन, चाय और पकोड़े, और एक गीत, यह फ़्लॅट अब घर बन रहा था ।

और वहाँ शफ़कत अमानत अली साहब की आवाज़ गा रही थी –
सावन बीतो जाए पिहरवा,
मन मेरा घबराए,
ऐसो गए परदेस पिया तुम
चैन हमें नहीं आए
मोरा सैय्यां मो से बोले ना…

Posted by:Salonee Pareek

I'm a story-teller at heart, and I use images and words to tell the stories I have to. I have a day job of a communications professional, and I moonlight as a photographer. I'm based in Ahmedabad, India. And I dream of travelling the world.

4 replies on “मौसम – 1

  1. आपका लेखन इस बंजर दुनिया में खुशबू की तरह है … लिखते रहो …

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